दिल्ली में क्लाउड सीडिंग ट्रायल असफल क्यों रहे? IIT कानपुर निदेशक की पूरी रिपोर्ट

दिल्ली क्लाउड सीडिंग ट्रायल असफल: IIT कानपुर निदेशक की रिपोर्ट

क्लाउड सीडिंग ट्रायल को दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए एक प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया, लेकिन यह पूरी तरह सफल नहीं हो पाया। इस प्रक्रिया में सेसना विमान का इस्तेमाल किया गया, जिसमें नमक और सिल्वर आयोडाइड आधारित फ्लेयर्स लगाए गए थे ताकि कृत्रिम वर्षा करवाई जा सके।

क्लाउड सीडिंग ट्रायल में सफलता क्यों नहीं मिली?

मंगलवार को दिल्ली में दो क्लाउड सीडिंग ट्रायल किए गए, लेकिन दोनों में बारिश नहीं हो सकी। IIT कानपुर के निदेशक मनींद्र अग्रवाल ने बताया कि यह ट्रायल “पूरी तरह सफल” नहीं रहा क्योंकि विमान से छोड़े गए फ्लेयर्स ने कोई वर्षा उत्पन्न नहीं की। उन्होंने बताया कि दो सॉर्टी किए गए — एक दोपहर में और एक शाम को, जिनमें कुल 14 फ्लेयर्स दागे गए, लेकिन बारिश नहीं हुई।

दिल्ली सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, मौसम विभाग (IMD) द्वारा अनुमानित नमी स्तर मात्र 10-15 प्रतिशत था, जो क्लाउड सीडिंग ट्रायल के लिए पर्याप्त नहीं था। अग्रवाल ने कहा, “आज के बादलों में नमी का स्तर काफी कम था, लगभग 15-20 प्रतिशत। ऐसे में वर्षा होने की संभावना बहुत कम थी।”

क्लाउड सीडिंग ट्रायल से प्रदूषण पर क्या असर पड़ा?

दिल्ली सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया कि क्लाउड सीडिंग ट्रायल के बाद कुछ क्षेत्रों में प्रदूषण के स्तर में मामूली गिरावट दर्ज की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में हल्की बारिश (0.1 मिमी और 0.2 मिमी) दर्ज की गई, जिससे पीएम2.5 और पीएम10 के स्तर में सुधार देखा गया।

उदाहरण के तौर पर, क्लाउड सीडिंग से पहले मईूर विहार, करोल बाग और बुराड़ी में पीएम2.5 का स्तर क्रमशः 221, 230 और 229 था, जो ट्रायल के बाद घटकर 207, 206 और 203 रह गया। इसी तरह पीएम10 का स्तर भी 207, 206 और 209 से घटकर 177, 163 और 177 पर आ गया।

आगामी ट्रायल और IIT कानपुर की योजना

IIT कानपुर निदेशक ने बताया कि बुधवार को तीसरा ट्रायल आयोजित करने की योजना है। उन्होंने कहा, “हम आशा करते हैं कि अब तक के प्रयासों से हमारी टीम को और आत्मविश्वास मिला है, ताकि आगे के क्लाउड सीडिंग ट्रायल को और प्रभावी ढंग से किया जा सके।”

दिल्ली के बाहरी क्षेत्रों जैसे खेकरा, बुराड़ी, नॉर्थ करोल बाग और मईूर विहार को इन ट्रायल्स में शामिल किया गया। हर फ्लेयर का वजन 2 से 2.5 किलोग्राम था और ट्रायल के दौरान आठ फ्लेयर्स का उपयोग किया गया।

इन परीक्षणों से यह तो स्पष्ट है कि क्लाउड सीडिंग ट्रायल तकनीकी रूप से संभव है, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए मौसम की अनुकूल स्थितियां अत्यंत आवश्यक हैं।

बाहरी प्राधिकृत लिंक: भारतीय मौसम विभाग (IMD)

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