H-1B वीजा शुल्क पर अदालत की रोक, भारतीय पेशेवरों को मिली बड़ी राहत
H-1B वीजा शुल्क को लेकर अमेरिका से एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। मैसाचुसेट्स के बोस्टन स्थित एक संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू किए गए 1 लाख डॉलर के H-1B वीजा शुल्क को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। इस फैसले से अमेरिका में काम करने की इच्छा रखने वाले हजारों विदेशी पेशेवरों और उन्हें रोजगार देने वाली कंपनियों को राहत मिली है। खासकर भारतीय पेशेवरों के लिए यह फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि H-1B कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थियों में भारतीय नागरिक शामिल हैं।
H-1B वीजा शुल्क पर अमेरिकी अदालत का बड़ा फैसला
सोमवार को आए इस फैसले में अदालत ने कहा कि ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाया गया 1 लाख डॉलर का H-1B वीजा शुल्क कानून के अनुरूप नहीं था। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब इस शुल्क वृद्धि के खिलाफ कई मुकदमे अमेरिकी अदालतों में लंबित थे। इससे पहले दिसंबर 2025 में वाशिंगटन डीसी की एक संघीय अदालत ने इसी प्रकार के शुल्क बढ़ोतरी आदेश को बरकरार रखा था। ऐसे में बोस्टन अदालत का फैसला इस मुद्दे पर नई बहस को जन्म दे रहा है।
क्या है H-1B वीजा कार्यक्रम?
अमेरिकी श्रम विभाग के अनुसार H-1B कार्यक्रम उन नियोक्ताओं के लिए बनाया गया है जो विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करना चाहते हैं। यह वीजा मुख्य रूप से तकनीकी, इंजीनियरिंग, वित्तीय और अन्य विशेषज्ञ क्षेत्रों में काम करने वाले पेशेवरों को दिया जाता है। इसके लिए आवेदक के पास कम से कम स्नातक डिग्री या समकक्ष योग्यता होना आवश्यक है।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य अमेरिकी कंपनियों को ऐसे कुशल कर्मचारियों तक पहुंच प्रदान करना है जिनकी विशेषज्ञता घरेलू कार्यबल में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होती। वर्षों से यह कार्यक्रम तकनीकी उद्योग की रीढ़ माना जाता रहा है। हर साल लगभग 65,000 H-1B वीजा जारी किए जाते हैं, जबकि उच्च शिक्षा प्राप्त उम्मीदवारों के लिए अतिरिक्त 20,000 वीजा उपलब्ध रहते हैं। चयन लॉटरी प्रणाली के माध्यम से किया जाता है और वीजा की अवधि सामान्यतः तीन से छह वर्ष तक होती है।
ट्रंप प्रशासन ने क्यों बढ़ाया था H-1B वीजा शुल्क?
सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा आवेदन शुल्क को औसतन 2,000 डॉलर से बढ़ाकर सीधे 1 लाख डॉलर कर दिया था। यह शुल्क उन कंपनियों को देना होता था जो विदेशी कुशल कर्मचारियों को प्रायोजित करती हैं। प्रशासन का मानना था कि इससे अमेरिकी नागरिकों के रोजगार अवसरों की रक्षा होगी और कंपनियां विदेशी कर्मचारियों पर कम निर्भर रहेंगी।
यह पहली बार नहीं था जब ट्रंप प्रशासन ने H-1B कार्यक्रम को लेकर सख्ती दिखाई हो। इससे पहले भी वीजा आवेदनों की जांच को कड़ा किया गया था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2018 में H-1B वीजा अस्वीकृति दर 24 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जबकि इससे पहले यह काफी कम रही थी।
भारतीयों पर क्या पड़ेगा असर?
H-1B वीजा शुल्क से जुड़ा यह फैसला भारतीय पेशेवरों के लिए बेहद अहम है। अमेरिकी प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में जारी किए गए H-1B वीजा में लगभग 70 प्रतिशत भारतीय नागरिकों को मिले थे। इसके बाद चीन दूसरे स्थान पर रहा, जिसकी हिस्सेदारी करीब 11 से 12 प्रतिशत थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि H-1B कार्यक्रम ने अमेरिका में भारतीय मूल के पेशेवरों की आर्थिक और सामाजिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बड़ी संख्या में भारतीय आईटी विशेषज्ञ, इंजीनियर, डेटा साइंटिस्ट और तकनीकी पेशेवर इसी कार्यक्रम के माध्यम से अमेरिका में रोजगार प्राप्त करते हैं। यदि 1 लाख डॉलर वाला H-1B वीजा शुल्क लागू रहता तो कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करना काफी महंगा हो जाता और इसका सीधा असर भारतीय पेशेवरों के अवसरों पर पड़ सकता था।
आगे क्या होगा?
हालांकि अदालत के इस फैसले का स्वागत कंपनियों और प्रवासी समुदाय ने किया है, लेकिन मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। व्हाइट हाउस ने संकेत दिया है कि इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दी जा सकती है। प्रशासन का कहना है कि H-1B कार्यक्रम का वर्षों से दुरुपयोग होता रहा है और शुल्क वृद्धि उसी दिशा में एक सुधारात्मक कदम थी।
एक आव्रजन विशेषज्ञ के अनुसार अदालत के फैसले से फिलहाल सभी हितधारकों को राहत मिली है, लेकिन अंतिम स्थिति तब स्पष्ट होगी जब संभावित अपील पर उच्च अदालत का निर्णय सामने आएगा। तब तक भारतीय पेशेवरों और अमेरिकी कंपनियों के लिए यह फैसला एक महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है।

