यूएई OPEC से बाहर: 2.9 मिलियन बैरल उत्पादन के साथ वैश्विक तेल बाजार पर असर
यूएई OPEC से बाहर होने का फैसला वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। लंबे समय से OPEC का हिस्सा रहा संयुक्त अरब अमीरात अब 1 मई से इस तेल उत्पादन समूह और OPEC+ गठबंधन को छोड़ देगा। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब ईरान युद्ध के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही ऊर्जा संकट का सामना कर रही है।
यूएई OPEC से बाहर होने का यह निर्णय लंबे समय से चल रही असंतुष्टि का परिणाम है। देश ने उत्पादन सीमाओं और सऊदी अरब के साथ तनावपूर्ण संबंधों के चलते यह कदम उठाया। ऊर्जा मंत्री के अनुसार, इस फैसले से यूएई को अधिक लचीलापन मिलेगा और वह अपने उत्पादन निर्णय स्वतंत्र रूप से ले सकेगा।
यूएई OPEC से बाहर: क्या है इसका असर?
यूएई OPEC से बाहर होने के बाद समूह की ताकत पर असर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इससे OPEC अपनी लगभग 15% उत्पादन क्षमता खो देगा। वर्तमान में यूएई लगभग 2.9 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन करता है, जबकि सऊदी अरब का उत्पादन लगभग 9 मिलियन बैरल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम के बाद सऊदी अरब के लिए OPEC को एकजुट रखना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। अब उसे बाजार संतुलन बनाए रखने और आंतरिक अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए अधिक प्रयास करने होंगे।
सऊदी अरब और यूएई के बीच बढ़ता तनाव
यूएई OPEC से बाहर होने के पीछे एक बड़ा कारण सऊदी अरब के साथ वर्षों से चला आ रहा मतभेद है। दोनों देशों के बीच तेल उत्पादन नीति और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर कई बार टकराव हुआ है। जहां यूएई अपनी उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग करना चाहता था, वहीं सऊदी अरब आपूर्ति सीमित रखने के पक्ष में रहा।
इसके अलावा, सऊदी अरब द्वारा विदेशी निवेश आकर्षित करने के प्रयासों ने भी प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया, जिससे दोनों देशों के संबंधों में और तनाव आया।
ईरान युद्ध और बाजार पर प्रभाव
यूएई OPEC से बाहर होने का फैसला ईरान युद्ध के बीच लिया गया है, जिसने वैश्विक ऊर्जा बाजार को पहले ही अस्थिर कर दिया है। ऊर्जा मंत्री ने कहा कि मौजूदा हालात में तेजी से निर्णय लेने की आवश्यकता है, जो OPEC के ढांचे के बाहर अधिक आसान होगा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय लंबे विचार-विमर्श के बाद लिया गया है और इसका बाजार पर बड़ा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि वर्तमान में बाजार में आपूर्ति की कमी बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम मध्य पूर्व की भू-राजनीति और वैश्विक तेल बाजार में बड़े बदलाव का संकेत हो सकता है। संभावना है कि भविष्य में अन्य देश भी इसी तरह के कदम उठा सकते हैं।

