तारिक रहमान निर्वासन से पीएम बने: बांग्लादेश चुनाव 2026 की बड़ी जीत

17 साल बाद लंदन से लौटे तारिक रहमान की ऐतिहासिक जीत

तारिक रहमान निर्वासन से पीएम बने, यह घटना बांग्लादेश की सियासत में ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखी जा रही है। 17 साल तक ब्रिटेन में निर्वासन का जीवन बिताने के बाद तारिक रहमान की वापसी और फिर राष्ट्रीय चुनाव में निर्णायक जीत ने देश की सत्ता संरचना को पूरी तरह बदल दिया है। वे ढाका-17 और बोगरा-6 दोनों संसदीय सीटों से विजयी हुए हैं, जिससे तारिक रहमान निर्वासन से पीएम बने की संभावना लगभग तय मानी जा रही है। उनकी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने संसद में दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ते हुए खुद को सबसे मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया है।

तारिक रहमान निर्वासन से पीएम बने: चुनाव परिणाम और बीएनपी की वापसी

हालिया राष्ट्रीय चुनाव में बीएनपी मुख्य दावेदार के रूप में मैदान में उतरी और 300 में से 292 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए, जबकि शेष सीटें छोटे सहयोगी दलों के लिए छोड़ी गईं। दूसरी ओर, जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व में 11-दलीय गठबंधन ने मुकाबला किया, लेकिन शुरुआती चरण से ही रुझान साफ था कि हवा बीएनपी के पक्ष में बह रही है। विभिन्न मीडिया प्रोजेक्शन के अनुसार, बीएनपी ने बहुमत के लिए आवश्यक 150 सीटों के आंकड़े को काफी पीछे छोड़ते हुए लगभग 212 सीटों तक बढ़त बना ली, जबकि जमात-गठबंधन 70 के आसपास सीटों पर सिमट गया। इस नतीजे के साथ ही तारिक रहमान निर्वासन से पीएम बने की तस्वीर और स्पष्ट हो गई, क्योंकि पार्टी के भीतर और बाहर उन्हें सर्वसम्मति से नेता के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।

बीएनपी के चुनाव समिति के प्रवक्ता ने भी यह दावा किया कि पार्टी कम से कम दो-तिहाई सीटें जीतने की राह पर है। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि तारिक रहमान दोनों सीटों से जीत चुके हैं और पार्टी अब औपचारिक रूप से सरकार बनाने की तैयारी कर रही है। जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख ने संयमित प्रतिक्रिया देते हुए परिणामों को स्वीकार किया और विरोध की राजनीति के बजाय सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने की बात कही। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से सड़क पर टकराव वाली राजनीति से दूर रहने और लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर रहकर जनता की आवाज उठाने का आह्वान किया।

तारिक रहमान का राजनीतिक सफर और निर्वासन से वापसी

तारिक रहमान निर्वासन से पीएम बने, लेकिन उनकी यात्रा की शुरुआत कई दशक पहले हुई थी। वे बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति जियौर रहमान और तीन बार की प्रधानमंत्री रहीं खालिदा जिया के बड़े बेटे हैं। 2001 से 2006 के बीच बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी की गठबंधन सरकार के दौर में वे सत्ता के केंद्र में माने जाते थे। कहा जाता है कि ढाका स्थित हवा भवन से वे एक तरह से छाया प्रधानमंत्री के रूप में फैसले लेते थे और सरकार की नीतियों पर गहरा प्रभाव रखते थे। इसी दौर में उन्हें “डार्क प्रिंस” जैसे नामों से भी बुलाया गया, जो उनके प्रभाव और विवाद दोनों को दर्शाता है।

2006 से 2008 के बीच देश में ज़बरदस्त राजनीतिक उठापटक हुई, चुनावों को लेकर अवामी लीग और बीएनपी के बीच टकराव बढ़ा और स्थिति इतनी बिगड़ी कि एक सैन्य समर्थित केयरटेकर सरकार को सत्ता संभालनी पड़ी। इसी दौरान तारिक रहमान को भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और एक हाई-प्रोफाइल हमले की साजिश से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया और करीब 17 महीने तक हिरासत में रखा गया। जेल में कथित यातना और स्वास्थ्य खराब होने के बाद वे इलाज के लिए लंदन चले गए और यहीं से उनका लंबा निर्वासन शुरू हुआ। बाद में अदालतों में चले मामलों में उन्हें दोषी ठहराया गया, लेकिन 2024 में छात्र-नेतृत्व वाले जन आंदोलन के बाद राजनीतिक बदलाव के साथ कई फैसलों पर पुनर्विचार हुआ और सजा से जुड़े अहम आदेश पलट दिए गए।

दिसंबर 2025 में अपनी मां खालिदा जिया के निधन के बाद तारिक रहमान आधिकारिक रूप से बीएनपी के अध्यक्ष चुने गए। इससे पहले वे पार्टी के कार्यकारी चेयरमैन के रूप में निर्णय ले रहे थे, लेकिन अब निर्विवाद रूप से शीर्ष नेतृत्व उनके हाथ में आ गया। इसी अवधि में बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा मोड़ आया, जब लंबे समय से सत्ता में रही अवामी लीग का पंजीकरण निलंबित कर दिया गया और उसकी प्रमुख नेता देश से बाहर रहीं। ऐसे माहौल में तारिक रहमान निर्वासन से पीएम बने की कथा ने तेज़ी पकड़ी और वे स्वाभाविक रूप से विपक्ष की सबसे प्रमुख आवाज बनकर उभरे।

नई सरकार की चुनौतियां, भारत से रिश्ते और सुधार एजेंडा

तारिक रहमान निर्वासन से पीएम बने के बाद नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश की विदेश नीति और खासकर भारत के साथ रिश्तों को संतुलित करना होगी। पिछले दौर में बांग्लादेश और भारत के संबंध काफी घनिष्ठ माने जाते थे, लेकिन हाल की राजनैतिक उथल-पुथल के बाद दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ा है। भारत को चिंता है कि नई सत्ता संरचना में बांग्लादेश का झुकाव क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों की ओर न बढ़ जाए और आंतरिक अस्थिरता पड़ोसी राज्यों को प्रभावित न करे। दूसरी ओर, तारिक रहमान ने सार्वजनिक रूप से यह संकेत दिए हैं कि वे भारत के साथ संबंधों को पारस्परिक सम्मान, आपसी समझ और समान हितों के आधार पर आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन वे यह भी साफ कर चुके हैं कि शरण दिए गए नेताओं और कार्यकर्ताओं का मुद्दा संवेदनशील रहेगा।

आंतरिक मोर्चे पर नई संसद के साथ बांग्लादेश में जुलाई नेशनल चार्टर पर भी जनमत लिया गया, जिसमें कई महत्वपूर्ण राजनीतिक सुधार शामिल हैं। इनमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल को दो बार तक सीमित करना, संसद के लिए एक ऊपरी सदन का गठन, और चुनाव से पहले 90 दिनों के लिए केयरटेकर सरकार की व्यवस्था को बहाल करना जैसे प्रावधान शामिल हैं। इन सुधारों का उद्देश्य सत्ता के केंद्रीकरण को रोकना, चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास बहाल करना है।

इसी बीच अंतरिम सरकार के प्रमुख, नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मुहम्मद यूनुस ने स्पष्ट कर दिया है कि नई निर्वाचित सरकार के गठन के साथ ही वे पद छोड़ देंगे। उनका अंतरिम कार्यकाल मुख्य रूप से देश को हिंसक उथल-पुथल से निकालकर स्थिर चुनावी प्रक्रिया तक ले जाने पर केंद्रित था। दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री की ओर से चुनावों की वैधता पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन भारी मतदान, प्रोजेक्शन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं के बीच यह साफ दिख रहा है कि मतदाताओं ने बदलाव के पक्ष में मजबूत संदेश दिया है। इस पूरे परिदृश्य में तारिक रहमान निर्वासन से पीएम बने की कहानी न केवल एक व्यक्तिगत राजनीतिक पुनरुत्थान है, बल्कि बांग्लादेश की लोकतांत्रिक यात्रा के नए अध्याय की शुरुआत भी है।

 

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