महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में भाजपा-शिवसेना की 66 सीटों पर बिनाविरोध जीत, कल्याण डोंबिवली में 21 वार्ड तय
महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में भाजपा-शिवसेना की 66 सीटों पर बिनाविरोध जीत
महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की बिनाविरोध जीत ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है, क्योंकि मतदान शुरू होने से पहले ही 68 उम्मीदवार निर्विरोध घोषित हो चुके हैं। महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में भाजपा-शिवसेना की 66 सीटों पर बिनाविरोध जीत और अजित पवार गुट की राकांपा के दो उम्मीदवारों की जीत ने राज्य की स्थानीय राजनीति में सत्तारूढ़ महायुति की पकड़ को और मजबूत कर दिया है।
नामांकन पत्र वापस लेने की अंतिम तारीख शुक्रवार थी और इसी दिन अन्य दलों तथा गठबंधनों के कई उम्मीदवारों ने अपने नाम वापस ले लिए, जिससे इन 68 नेताओं के लिए निर्विरोध विजयी होने का रास्ता साफ हो गया। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में भाजपा-शिवसेना की 66 सीटों पर बिनाविरोध जीत को सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए शुरुआती मनोवैज्ञानिक बढ़त माना जा रहा है।
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कल्याण डोंबिवली, जलगांव और पनवेल में महायुति की मजबूत पकड़
सबसे ज्यादा विजेता मुंबई महानगर क्षेत्र के महत्वपूर्ण कल्याण डोंबिवली नगर निगम से हैं, जहां महायुति के 21 उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए गए हैं, जिनमें 15 भाजपा और 6 शिवसेना (शिंदे गुट) के हैं। इस तरह कल्याण डोंबिवली में नतीजों से पहले ही भाजपा-शिवसेना की रणनीतिक बढ़त साफ दिखाई दे रही है, जो आगे के प्रचार अभियान में भी असर डाल सकती है।
उत्तर महाराष्ट्र के जलगांव में, जो लंबे समय से भाजपा और शिवसेना दोनों के लिए उपजाऊ राजनीतिक ज़मीन रहा है, दोनों दलों को कुल 12 पार्षद मिले हैं और यहां भी छह-छह उम्मीदवार बिनाविरोध विजयी घोषित हुए हैं। मुंबई महानगर क्षेत्र के पनवेल में भी रुझान जारी रहा, जहां भाजपा के 7 उम्मीदवार बिना मतदान के ही जीत गए, जिससे महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में भाजपा-शिवसेना की 66 सीटों पर बिनाविरोध जीत का आंकड़ा और मजबूत हुआ।
एनसीपी (शरदचंद्र पवार) गुट के मजबूत गढ़ माने जाने वाले भिवंडी में भी भाजपा ने 6 सीटों पर बिनाविरोध जीत दर्ज कर अपनी संगठनात्मक क्षमता का प्रदर्शन किया। वहीं, राज्य के अन्य हिस्सों में भी महायुति के पक्ष में छोटे लेकिन राजनीतिक रूप से अहम लाभ दर्ज किए गए, जो आने वाले चरणों में प्रचार और बूथ प्रबंधन के लिए सत्तारूढ़ गठबंधन को अतिरिक्त आत्मविश्वास देंगे।
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ठाणे, धुले और अहिल्या नगर में नतीजों का राजनीतिक संदेश
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के गृहक्षेत्र ठाणे में भाजपा के साथ दिख रही खटास के बावजूद, उपमुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली शिवसेना ने यहां 6 सीटों पर बिनाविरोध जीत दर्ज की है। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने ठाणे में प्रक्रिया और सत्तारूढ़ पक्ष के तौर-तरीकों पर सवाल उठाते हुए विरोध प्रदर्शन भी किया, जिससे स्थानीय स्तर पर राजनीतिक तनाव और बढ़ गया।
धुले में भाजपा के 3 उम्मीदवार बिनाविरोध जीत गए, जबकि अहिल्या नगर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दो और भाजपा के एक उम्मीदवार ने बिना मतदान के ही जीत हासिल की। चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में भाजपा-शिवसेना की 66 सीटों पर बिनाविरोध जीत न केवल महायुति के लिए ताज़ा ऊर्जा का काम करेगी बल्कि हाल ही में संपन्न नगर परिषद चुनावों में लगभग क्लीन स्वीप के बाद राज्य में सत्ता पक्ष के आत्मविश्वास को और बढ़ाएगी। विशेषज्ञों की राय है कि इन बिनाविरोध जीतों के चलते सत्तारूढ़ गठबंधन को उन क्षेत्रों में प्रचार पर अधिक संसाधन और समय लगाने का मौका मिलेगा, जहां मुकाबला कड़ा है। साथ ही, विपक्ष के लिए यह नतीजे एक चेतावनी हैं कि यदि स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक मेहनत और उम्मीदवार चयन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में भाजपा-शिवसेना की 66 सीटों पर बिनाविरोध जीत जैसी तस्वीर अन्य शहरों में भी दोहराई जा सकती है।
उधर, उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने आरोप लगाया है कि सत्तारूढ़ पक्ष ने धनबल और दबाव की राजनीति के ज़रिए विपक्षी उम्मीदवारों से नामांकन वापस करवाए हैं। राज्य चुनाव आयोग ने इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं, ताकि यह पता चल सके कि नामांकन पत्र वास्तव में स्वेच्छा से वापस लिए गए या फिर किसी प्रकार के दबाव और प्रलोभन का इस्तेमाल किया गया। आयोग की जांच रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में भाजपा-शिवसेना की 66 सीटों पर बिनाविरोध जीत पूरी तरह निष्पक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया का परिणाम है या फिर राजनीतिक दबाव और सौदेबाज़ी की पृष्ठभूमि भी इसमें छिपी हुई है। फिलहाल इतना साफ है कि बिना एक भी वोट डले, महायुति ने राज्य की कई नगर निगमों में अपना खाता मजबूती से खोल दिया है और आगे के चुनावी दौर में यह बढ़त निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
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