Is One S Jaishankar Enough For India? पुणे फेस्टिवल में बोले- “एक ही मोदी काफी”, कृष्ण-हनुमान हैं सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ
एस जयशंकर कृष्ण हनुमान कूटनीतिज्ञ बताते हुए बोले कि भारत की कूटनीति की गहरी जड़ें महाभारत और रामायण जैसी हमारी परंपराओं में हैं, जहां रणनीति और राज्य-शास्त्र के अद्भुत उदाहरण मिलते हैं।
एस जयशंकर कृष्ण हनुमान कूटनीतिज्ञ दृष्टि
पुणे बुक फेस्टिवल में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत की अपनी सोच, शब्दावली और उदाहरणों को कूटनीतिक विमर्श में ज्यादा जगह देने की जरूरत है, क्योंकि हमारी परंपराओं में रणनीति और नीति का समृद्ध भंडार है। उन्होंने बताया कि महाभारत की कथा में भगवान कृष्ण और रामायण की कथा में भगवान हनुमान दुनिया के सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ माने जा सकते हैं।
जयशंकर ने कहा कि आज की दुनिया बहुध्रुवीय और गठबंधन-आधारित राजनीति के दौर से गुजर रही है, जहां किसी के पास पूर्ण बहुमत नहीं होता और अलग-अलग मुद्दों पर अलग संयोजन बनते-बिखरते रहते हैं। उनके अनुसार, ऐसे परिवेश में एक ही स्थायी सिद्धांत होना चाहिए कि हर निर्णय में देशहित सर्वोच्च हो और वही अंतिम कसौटी बने।
कृष्ण और हनुमान को “महान कूटनीतिज्ञ” क्यों कहा
विदेश मंत्री ने कहा कि आम तौर पर लोग महाभारत को सत्ता संघर्ष और परिवारिक विवाद के रूप में देखते हैं, लेकिन गहराई से देखें तो इसमें जटिल कूटनीति, रणनीति और शक्ति-संतुलन की बारीकियां छिपी हैं। इसी तरह रामायण को केवल आस्था की कथा मान लिया जाता है, जबकि उसमें भी युद्ध-पूर्व तैयारी, सूचना-संग्रह, मनोवैज्ञानिक दबाव और रणनीतिक योजना के कई स्तर दिखाई देते हैं।
एस जयशंकर कृष्ण हनुमान कूटनीतिज्ञ उदाहरण समझाते हुए बोले कि भगवान कृष्ण ने महाभारत में दूत, मध्यस्थ, सलाहकार और मार्गदर्शक के रूप में जो भूमिका निभाई, वह किसी भी आधुनिक कूटनीतिज्ञ से कम नहीं है। वहीं भगवान हनुमान को श्रीलंका भेजा गया तो उनका मुख्य काम जानकारी जुटाना था, लेकिन उन्होंने उससे आगे बढ़कर सीता माता से मुलाकात की, उनका मनोबल बढ़ाया, रावण के दरबार की अंदरूनी स्थिति को परखा और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाते हुए लंका को जला दिया।
उन्होंने कहा कि हनुमान को एक काम दिया गया था, लेकिन उन्होंने उसी मिशन के दौरान कई अतिरिक्त उद्देश्यों को भी पूरा कर लिया और सबकुछ अपेक्षा से अधिक परिणाम के साथ किया। जयशंकर के अनुसार, अगर हम ऐसे व्यक्तित्वों को दुनिया के सामने कूटनीति के आदर्श रूप में नहीं पेश करते, तो यह हमारी संस्कृति के साथ न्याय नहीं होगा।
पश्चिमी पाठ्यपुस्तकें, भारतीय संदर्भ और “एक ही मोदी” वाला जवाब
एस जयशंकर ने कहा कि रणनीति और कूटनीति पर उपलब्ध ज्यादातर पाठ्यपुस्तकें पश्चिमी लेखकों ने लिखी हैं, जिनमें भारतीय परंपरा और हमारे अपने शब्द और संदर्भ लगभग नदारद हैं। वे बार-बार पढ़ते-पढ़ते इस धारणा से ऊब गए कि भारत बहुत रणनीतिक है, लेकिन उसके पास अपनी रणनीति और राज्य-शास्त्र की कोई विरासत नहीं, जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने कहा कि भारत के लोग अपनी मान्यताओं और संस्कृति के साथ बड़े होते हैं, लेकिन कूटनीतिक चर्चा में हम अपने ही शब्दों और उदाहरणों का उपयोग नहीं करते, जिससे दुनिया भी उन्हें नहीं जान पाती। एस जयशंकर कृष्ण हनुमान कूटनीतिज्ञ दृष्टांतों के जरिए दुनिया को यह समझाना चाहते हैं कि भारत की कूटनीतिक सोच हजारों साल पुरानी परंपराओं में निहित है। ]
कार्यक्रम के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या एक एस जयशंकर भारत के लिए पर्याप्त हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि यह सवाल ही गलत है और असली सवाल यह होना चाहिए था कि “एक मोदी हैं”। उन्होंने कहा कि अंततः देशों को उनके नेता और उनका विजन परिभाषित करता है, जबकि अधिकारी और टीमें उस विजन को लागू करने का काम करते हैं। जयशंकर ने कहा कि जिस तरह भगवान हनुमान अंततः अपने आराध्य की सेवा में समर्पित रहते हैं, वैसे ही किसी भी देश में वास्तविक अंतर दूरदर्शी नेतृत्व, स्पष्ट दृष्टि और आत्मविश्वास से आता है। उन्होंने संकेत दिया कि मौजूदा दौर में भारत के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता और विजन ने वैश्विक स्तर पर देश की छवि को मजबूत किया है।
ब्रेन ड्रेन पर एक सवाल के जवाब में एस जयशंकर ने कहा कि आज “ब्रेन ड्रेन” का मुद्दा कहीं अधिक जटिल है और इसे केवल नकारात्मक रूप में नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार, आज वैश्विक स्तर पर भारतीय प्रतिभा की भारी मांग है और दुनिया भर के देश भारतीय पेशेवरों को अपने यहां काम करने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि हाल ही में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हुई बातचीत में भी इस बात पर सहमति बनी कि भारतीय नागरिकों के लिए वहां काम के अवसर बढ़ाए जाएं। एस जयशंकर कृष्ण हनुमान कूटनीतिज्ञ सन्दर्भों के साथ-साथ युवा भारतीयों को सलाह देते हैं कि वे खुद को वैश्विक कार्यस्थल का हिस्सा मानें और विदेश में मिले अनुभव व संसाधनों का उपयोग अंततः भारत के लिए भी करें।
जयशंकर ने कहा कि यूरोप जैसे क्षेत्रों में भले ही आव्रजन पर बहस चल रही हो, लेकिन भारतीय समुदाय को वहां सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है और उनकी मेहनत, अनुशासन और कौशल की अच्छी प्रतिष्ठा है। उनके मुताबिक, लंबे समय में यह “ग्लोबल ब्रांड ऑफ इंडियंस” भारत की साख को और मजबूत करता है और देश के लिए अवसरों के नए दरवाजे खोलता है।उन्होंने यह भी जोड़ा कि कई भारतीय पेशेवर विदेश में कुछ साल काम करने के बाद वापस लौटकर भारत में उद्यम शुरू करते हैं, जिससे यहां रोजगार और निवेश के नए स्रोत बनते हैं। इस तरह वैश्विक अवसरों का लाभ उठाते हुए भी युवाओं के पास देश को योगदान देने के कई रास्ते खुले रहते हैं।
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