जम्मू-कश्मीर चुनाव आतंकवाद: चुनाव बाद बढ़ते हमलों की सच्चाई

चुनाव बाद जम्मू-कश्मीर में बढ़ते आतंकी खतरे का विश्लेषण।

जम्मू-कश्मीर चुनाव आतंकवाद पर बदलता परिदृश्य

जम्मू-कश्मीर में हाल के चुनावों के बाद आतंकी घटनाओं में अचानक वृद्धि ने सुरक्षा एजेंसियों को चौकन्ना कर दिया है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद जो शांति का दौर चल रहा था, वह अब चुनौती का सामना कर रहा है। पहलगाम की हालिया घटना और लाल किले पर हुए हमले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवादी फिर से सक्रिय हो रहे हैं।

स्थानीय राजनीति और कट्टरपंथ का प्रभाव

कश्मीर की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय रहे कुछ प्रभावशाली परिवारों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। दशकों से बनी व्यवस्था और इसके माध्यम से विकसित नेटवर्क अब संदिग्ध गतिविधियों के केंद्र में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर में रेडिकल विचारधारा को बढ़ावा देने में स्थानीय राजनीतिक तंत्र की अप्रत्यक्ष भूमिका हो सकती है। पहलगाम की घटना के बाद एक नया पैटर्न सामने आया है – कश्मीर से बाहर रह रहे कश्मीरियों का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में किया जा रहा है। यह रणनीति पाकिस्तान के एजेंडे का हिस्सा प्रतीत होती है।

पाकिस्तान की बदलती रणनीति

पाकिस्तान में अफगान, मुल्तानी, सिंधी, पश्तून और बलोच समुदाय इस्लामाबाद के खिलाफ विरोध और हिंसक घटनाएं करते रहते हैं। इसी तर्ज पर भारत में भी एक साजिश रची जा रही है – कश्मीरी लोगों से शुरू करके धीरे-धीरे भारत की पूरी मुस्लिम आबादी को इसमें शामिल करने का प्रयास हो सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय राजनीतिक परिवारों के प्रभाव और नेटवर्क का दुरुपयोग इस साजिश को अंजाम देने के लिए किया जा रहा है।

वैश्विक राजनीति और क्षेत्रीय अस्थिरता

ऑपरेशन सिंदूर के बाद दुनिया में भारत को देखने का नजरिया बदल गया। एक सशक्त भारत कई वैश्विक शक्तियों को नागवार गुजर रहा है। इसके साथ ही भारत-अमेरिका संबंधों में आर्थिक तनाव, भारत-रूस मित्रता में मजबूती और भारत-चीन संबंधों में सुधार के प्रयास भी इस परिदृश्य को प्रभावित कर रहे हैं। पश्चिमी शक्तियों को यह स्थिति रास नहीं आ रही और पाकिस्तान व बांग्लादेश को इस्तेमाल कर भारत में आतंकवाद और अस्थिरता का माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार भारतीय सुरक्षा एजेंसियां आजाद भारत के सबसे बड़े मैनहंट ऑपरेशन में लगी हुई हैं। हर वह कड़ी जो आतंकवाद को बढ़ावा दे सकती है, उस पर या तो कार्रवाई हो रही है या तैयारी चल रही है। मिली खुफिया जानकारी के अनुसार और घटनाओं की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

खुफिया रिपोर्ट के अनुसार 6 दिसंबर को घटनाएं कराकर हिंदू-मुस्लिम समुदायों में दरार लाने का प्रयास किया जाना था। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और एजेंसियां इस साजिश को कहां तक रोक पाती हैं। यह समझना जरूरी है कि बम धमाके धर्म पूछकर जान नहीं लेते। लाल किले पर हुए हमले में कई मुस्लिम नागरिक भी शहीद हुए। आतंकवाद किसी एक समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे देश और मानवता के खिलाफ है।

इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए सामुदायिक एकता को मजबूत रखना, संदिग्ध राजनीतिक नेटवर्क पर कड़ी निगरानी, सुरक्षा एजेंसियों को पूर्ण समर्थन और जनता को भड़काऊ प्रचार से सावधान रखना बेहद आवश्यक है। खतरा बड़ा है, लेकिन सतर्कता और एकजुटता से इस चुनौती का सामना किया जा सकता है। यह समय देश को तोड़ने की साजिशों को समझने और उन्हें नाकाम करने का है।

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