यूरो-भारत साझेदारी 2025: नई आर्थिक रणनीति और डॉलर पर असर
यूरो-भारत साझेदारी वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नया अध्याय लिख रही है, जो डॉलर वर्चस्व को चुनौती दे रही है। राष्ट्रपति ट्रंप के हालिया बयानों और उनकी विरोधाभासी नीतियों ने विश्व राजनीति को नई दिशा दी है। उन्होंने भारत, रूस और चीन के बीच बढ़ते संबंधों पर चिंता जताते हुए कहा कि “लगता है हमने भारत और रूस को गहरे, अंधेरे चीन के हवाले खो दिया है।” यह बयान अमेरिकी विदेश नीति की दुविधा और बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का स्पष्ट संकेत देता है।
ट्रंप प्रशासन की नीतियों में विरोधाभास साफ दिख रहा है। एक ओर वे भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों को “पूर्णतः एकतरफा आपदा” कहकर भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लगा रहे हैं, वहीं यूरोपीय संघ से भारत और चीन पर 100% टैरिफ लगाने का दबाव बना रहे हैं। यह दोहरी नीति अमेरिकी रणनीति की अस्पष्टता को उजागर करती है।
डॉलर वर्चस्व पर बढ़ती चुनौतियां
बिडेन प्रशासन द्वारा रूसी डॉलर रिजर्व को फ्रीज करना वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इस कदम ने अन्य देशों को भी डॉलर आधारित व्यापारिक प्रणाली की सुरक्षा पर सवाल उठाने के लिए मजबूर किया। अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की घटती लोकप्रियता और बढ़ता आंतरिक कर्ज अमेरिकी आर्थिक शक्ति को कमजोर कर रहा है। इसी बीच भारत और चीन रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदार बन गए हैं, जो यूरो-भारत साझेदारी को और प्रासंगिक बनाता है।
भारत-यूरोपीय संघ व्यापार की नई संभावनाएं
यूरोपीय देश गंभीर आर्थिक चुनौतियों से गुजर रहे हैं। ऊर्जा संकट, महंगाई और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में गिरावट ने यूरोपीय अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है। नाटो गठबंधन और यूक्रेन युद्ध का बोझ, रक्षा खर्च में वृद्धि, और अमेरिकी आर्थिक दबावों ने उनकी स्थिति कठिन कर दी है।
इन परिस्थितियों में यूरो-भारत साझेदारी एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभर रही है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2025 तक वार्ता पूरी करने पर सहमति जताई है। यह समझौता दोनों पक्षों को आर्थिक लाभ देगा और वैश्विक तनाव के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को मजबूत करेगा।
भारत के लिए फायदे: डॉलर पर निर्भरता कम करना, अमेरिकी टैरिफ से बचाव, नए बाजारों तक पहुंच, और तकनीकी सहयोग में वृद्धि।
यूरोपीय संघ के लिए फायदे: डॉलर आधारित व्यापार में कमी, अमेरिकी आर्थिक दबाव से राहत, भारतीय बाजार तक बेहतर पहुंच और यूरो की वैश्विक स्थिति में सुधार।
यूरोपीय संघ के देश अमेरिकी आर्थिक वर्चस्व से निकलने के लिए वैकल्पिक रणनीतियां तैयार कर रहे हैं। भारत के साथ यूरो आधारित व्यापार इस रणनीति का अहम हिस्सा है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ECB) यूरो की स्थिति मजबूत करने के लिए नई नीतियां बना रहा है। बड़े बाजारों के साथ व्यापार से यूरो की अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता बढ़ेगी और यूरो-भारत साझेदारी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देगी।
अंततः, यह स्पष्ट है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव हो रहा है। अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व कमजोर हो रहा है और यूरो-भारत साझेदारी इस बदलाव में अहम भूमिका निभा सकती है। यूरोपीय संघ और भारत के बीच मजबूत संबंध न केवल दोनों के लिए लाभकारी होंगे, बल्कि एक नई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की नींव रखेंगे।

