कांग्रेस का असहिष्णु इतिहास: नेहरू से सोनिया तक उजागर

कांग्रेस का असहिष्णु इतिहास नेहरू से सोनिया तक

कांग्रेस का असहिष्णु इतिहास एक बार फिर चर्चा में है। भाजपा नेता शहज़ाद पूनावाला ने कांग्रेस पार्टी को भारतीय राजनीति में “सबसे असहिष्णु संगठन” करार दिया है। उनकी टिप्पणी तब आई जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने आरएसएस पर बीआर अंबेडकर और भारतीय संविधान का ऐतिहासिक रूप से विरोध करने का आरोप लगाया। पूनावाला ने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वही पार्टी उन आतंकवादियों का समर्थन करती है जिन्हें एनआईए ने पहचाना है। उन्होंने सवाल किया कि क्या कांग्रेस भूल गई कि डॉ. अंबेडकर को भारत रत्न से किसने वंचित किया?

यह बयान केवल एक राजनीतिक हमला नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक बहस को जन्म देता है — क्या कांग्रेस का असहिष्णु इतिहास भारत में असहमति को दबाने और लोकतंत्र को सीमित करने का गवाह रहा है? नेहरू से सोनिया गांधी तक के राजनीतिक सफर में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जो इस धारणा को और मजबूत करते हैं।

कांग्रेस का असहिष्णु इतिहास और सत्तावादी विरासत

जवाहरलाल नेहरू: असहिष्णुता की नींव

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अक्सर लोकतंत्र के चैंपियन के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन उनका शासन कई सत्तावादी कदमों से भरा हुआ था। नेहरू आलोचना बर्दाश्त नहीं करते थे। मीडिया पर सेंसरशिप लगाना, संपादकों पर दबाव डालना और विरोध करने वाले पत्रकारों को निशाना बनाना आम बात थी।

1950 में लाया गया निवारक नजरबंदी अधिनियम बिना मुकदमे के कैद की अनुमति देता था और कांग्रेस सरकार ने इसे राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। इसके अलावा 1959 में नेहरू ने केरल की पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया। इससे राजनीतिक विरोध सहने की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े हुए।

इंदिरा गांधी: आपातकाल का काला अध्याय

अगर नेहरू ने असहिष्णुता की नींव रखी तो इंदिरा गांधी ने इसे संस्थागत रूप दे दिया। 1975 में लगाए गए आपातकाल को कांग्रेस का असहिष्णु इतिहास का सबसे अंधकारमय अध्याय कहा जाता है। इस दौरान:

  • विपक्षी नेताओं को बिना किसी आरोप के गिरफ्तार किया गया।
  • प्रेस की स्वतंत्रता पर पूरी तरह से ताला लगा दिया गया।
  • मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया।
  • जबर्दस्ती नसबंदी अभियान चलाया गया।

जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इस दौर में कई रहस्यमय मौतें भी हुईं। 42वें संविधान संशोधन ने प्रधानमंत्री को अभूतपूर्व शक्तियाँ दीं।

राजीव गांधी: लोकतंत्र पर नियंत्रण की परंपरा जारी

राजीव गांधी को आधुनिक छवि के नेता के रूप में जाना गया, लेकिन उनके कार्यकाल में भी कांग्रेस का असहिष्णु इतिहास जारी रहा। 1985 में शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट कर उन्होंने धार्मिक तुष्टिकरण का संदेश दिया। 1984 में सिख विरोधी दंगों में कांग्रेस नेताओं पर हिंसा भड़काने के आरोप लगे।

राजीव गांधी ने प्रेस की स्वतंत्रता पर भी परोक्ष दबाव डाला और जांच करने वाले पत्रकारों को मानहानि मुकदमों से धमकाया गया। बोफोर्स घोटाले के दौरान कई गवाहों की रहस्यमय मौतें भी हुईं, जिसने कांग्रेस की पारदर्शिता पर सवाल उठाए।

सोनिया गांधी और आधुनिक कांग्रेस

सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अपने पुराने तौर-तरीकों को आधुनिक तरीकों से जारी रखा। 2G घोटाले के दौरान व्हिसलब्लोअर को निशाना बनाया गया। एनजीओ और आलोचकों को कर जांचों और प्रशासनिक दबाव में रखा गया। यही वह समय था जब कांग्रेस ने खुद “बढ़ती असहिष्णुता” की कहानी गढ़ी, लेकिन अपने इतिहास को नज़रअंदाज कर दिया।

अंबेडकर और एनआईए विवाद

शहज़ाद पूनावाला ने सही कहा कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर को कांग्रेस ने भारत रत्न से वंचित रखा। 1990 में गैर-कांग्रेसी सरकार में उन्हें यह सम्मान दिया गया। दूसरी ओर, एनआईए से जुड़े मामलों में कांग्रेस नेताओं द्वारा आतंकियों का समर्थन करने के आरोप लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित था, न कि नागरिक स्वतंत्रता की चिंता से।

असहिष्णुता बहस और ऐतिहासिक साक्ष्य

2015 में जब कांग्रेस ने “अवार्ड वापसी” अभियान चलाया, तो उसने मोदी सरकार पर असहिष्णुता का आरोप लगाया। लेकिन ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताता है:

  • कांग्रेस शासन में आपातकाल घोषित हुआ।
  • राजनीतिक विरोधियों को कैद किया गया।
  • मीडिया सेंसर किया गया।
  • संवैधानिक हेरफेर हुआ।
  • असहमति रखने वालों पर हिंसा के आरोप लगे।

निष्कर्ष: क्या कांग्रेस कभी सहिष्णु थी?

नेहरू से लेकर सोनिया तक कांग्रेस का असहिष्णु इतिहास एक ही कहानी कहता है — सत्ता को अपने हाथों में केंद्रित रखना, विरोधियों को चुप कराना और लोकतंत्र को सीमित करना। भाजपा नेता शहज़ाद पूनावाला का बयान इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को फिर से सामने लाता है। सवाल अब यह नहीं है कि कांग्रेस असहिष्णु है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह कभी सहिष्णु थी?

 

🛑 डिस्क्लेमर:
यह लेख लेखक की व्यक्तिगत संपादकीय राय पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार, टिप्पणियाँ और विश्लेषण पूरी तरह लेखक की अपनी विवेकपूर्ण समझ का परिणाम हैं। यह किसी संस्था, संगठन या आधिकारिक स्रोत की पुष्टि या समर्थन नहीं करते। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल सूचना और विचार-विमर्श के उद्देश्य से लें।

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