भारत-अमेरिका व्यापारिक होड़ बनाम यूरोपीय संघ: भारत की बड़ी रणनीति 2025
भारत-अमेरिका व्यापारिक होड़: वैश्विक व्यापार के रंगमंच पर भारत आज एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनकर उभरा है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं – अमेरिका और यूरोपीय संघ – भारत के साथ व्यापारिक समझौते पर हस्ताक्षर करने की होड़ में लगी हैं। यह केवल एक व्यापारिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि आर्थिक वर्चस्व और भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन का मामला है।
भारत-अमेरिका व्यापारिक होड़: यूरोपीय संघ का भारत के साथ व्यापारिक महत्वाकांक्षा
यूरोपीय संघ और भारत के बीच सेवा व्यापार 2023 में €59.7 अरब तक पहुंच गया, जो 2020 में €30.4 अरब था। भारत और यूरोपीय संघ के बीच द्विपक्षीय वस्तु व्यापार 2024 तक USD 135 अरब तक पहुंच गया है। इसमें भारत का यूरोपीय संघ को निर्यात USD 76 अरब और यूरोपीय संघ का भारत को निर्यात USD 59 अरब है।
28 फरवरी 2025 को, यूरोपीय आयोग की भारत यात्रा के बाद, आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त रूप से सहमति व्यक्त की कि दोनों पक्षों को 2025 के दौरान वार्ता समाप्त करने का प्रयास करना चाहिए। हाल ही में एक उच्च स्तरीय यूरोपीय संघ का प्रतिनिधिमंडल नई दिल्ली पहुंचा है जो भारत-यूरोपीय संघ FTA समझौते को मजबूत करने का लक्ष्य रखता है। यूरोपीय संघ और भारत मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए अधिकतम प्रयास कर रहे हैं।
अमेरिका की रणनीति और चुनौतियां
अमेरिका का लक्ष्य भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार को 2024 के $210 अरब से 2030 तक $500 अरब तक दोगुना से अधिक करना है। इसके लिए उन्होंने 2025 के पतझड़ तक “पारस्परिक रूप से लाभकारी, बहु-क्षेत्रीय द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTA)” की पहली किस्त पर वार्ता की योजना की घोषणा की है। अगस्त 2025 में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की भारत यात्रा रद्द कर दी गई थी, जो 25-29 अगस्त के बीच होने की उम्मीद थी। हालांकि जून 2025 में एक उच्च स्तरीय अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधिमंडल नई दिल्ली में द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTA) पर वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए आया था।
ट्रंप प्रशासन यूरोपीय संघ पर दबाव डाल रहा है कि वह चीन और भारत पर 100% टैरिफ लगाए। अमेरिका का रूस के साथ द्विपक्षीय व्यापार 2024 में $5.2 अरब था, जबकि 2021 में यह $36 अरब था। इस पृष्ठभूमि में भारत को निशाना बनाना अनुचित और अनुपयुक्त है। वाशिंगटन की आक्रामक टैरिफ नीति ने भारत और यूरोपीय संघ को करीब लाया है, भले ही अमेरिका ने ब्रसेल्स पर रूसी तेल की खरीदारी के लिए नई दिल्ली को मंजूरी देने का दबाव डाला हो।
यूरोपीय संघ की बढ़त, डॉलर वर्चस्व और भारत की रणनीतिक स्थिति
यूरोपीय संघ-भारत व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद की 2025 की शुरुआत में बैठक ने सुरक्षा, समृद्धि और सतत विकास में साझा भू-रणनीतिक चुनौतियों और हितों को स्वीकार किया। दोनों पक्ष मानते हैं कि ट्रंप की संभावित नीतियों सहित चल रही अनिश्चितता के खिलाफ लचीलापन बढ़ाने के लिए बलों को मिलाना आवश्यक है। यूरोपीय संघ के पास भारत के साथ व्यापारिक समझौते में अमेरिका की तुलना में कम राजनीतिक बाधाएं हैं। रूसी तेल के मुद्दे पर यूरोपीय संघ अमेरिका की तुलना में अधिक लचीला रुख अपना रहा है।
यदि भारत यूरोपीय संघ के साथ व्यापक व्यापारिक समझौता कर लेता है, तो यह डॉलर के वर्चस्व को चुनौती दे सकता है। यूरो में व्यापार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, जिससे अमेरिकी डॉलर की वैश्विक मुद्रा के रूप में स्थिति कमजोर हो सकती है। भारत-यूरोपीय संघ का मजबूत व्यापारिक गठबंधन एक नए आर्थिक ब्लॉक का निर्माण कर सकता है, जो अमेरिकी आर्थिक हितों के लिए चुनौती बन सकता है। भारत अपनी पारंपरिक बहुध्रुवीय विदेश नीति के तहत दोनों शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने का प्रयास कर रहा है। यह रणनीति भारत को बेहतर सौदेबाजी की स्थिति प्रदान करती है। भारत दोनों प्रस्तावों का सूक्ष्म विश्लेषण कर रहा है। यूरोपीय संघ का प्रस्ताव तकनीकी सहयोग, हरित ऊर्जा, और कम राजनीतिक शर्तों के साथ आता है, जबकि अमेरिका का प्रस्ताव रक्षा सहयोग और उच्च निवेश के साथ आता है।
मुख्य अड़चन यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट और खाद्य संबंधी विवाद है। इन मुद्दों को सुलझाना समझौते की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। अमेरिका के साथ मुख्य समस्या भारत की रूस के साथ ऊर्जा व्यापार और अमेरिकी टैरिफ नीति है। यह राजनीतिक मतभेद व्यापारिक वार्ता को जटिल बनाते हैं। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, यूरोपीय संघ के साथ समझौता पहले होने की संभावना अधिक दिखती है। 2025 के अंत तक समझौते को अंतिम रूप देने की प्रतिबद्धता और तीव्र वार्ता इसका प्रमाण है। यदि भारत यूरोपीय संघ के साथ पहले व्यापक व्यापारिक समझौता कर लेता है, तो यह निश्चित रूप से अमेरिकी आर्थिक रणनीति और डॉलर के वैश्विक वर्चस्व के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। भारत के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर है जहां वह अपनी आर्थिक शक्ति का उपयोग करके वैश्विक व्यापार के नियमों को अपने अनुकूल बना सकता है। यह केवल व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि 21वीं सदी के आर्थिक और राजनीतिक शक्ति संतुलन का निर्धारक हो सकता है।
अधिक जानकारी के लिए देखें: World Trade Organization

