अमेरिकी डॉलर वर्चस्व को चुनौती: चीन की 20% ऊर्जा आपूर्ति पर रणनीति
अमेरिकी डॉलर वर्चस्व और भू-राजनीतिक रणनीति का विश्लेषण वैश्विक राजनीति की गहराई दर्शाता है। वैश्विक राजनीति में अमेरिका की सक्रियता को केवल सैन्य या लोकतांत्रिक हस्तक्षेप के रूप में देखना अधूरा विश्लेषण होगा। वास्तविकता यह है कि अमेरिकी डॉलर वर्चस्व की वैश्विक मुद्रा के रूप में स्थिति अमेरिकी विदेश नीति का केंद्रीय तत्व है।
डॉलर वर्चस्व को चुनौती
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से अमेरिकी डॉलर वर्चस्व विश्व व्यापार की प्रमुख मुद्रा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय तेल व्यापार, वैश्विक रिजर्व और व्यापारिक लेनदेन में डॉलर की केंद्रीय भूमिका ने अमेरिका को अभूतपूर्व आर्थिक शक्ति प्रदान की है। लेकिन पिछले दशक में भारत और चीन जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं ने इस एकाधिकार को चुनौती देना शुरू किया है। चीन ने युआन को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बनाने के प्रयास तेज किए हैं और कई देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का उपयोग शुरू किया है। भारत भी रुपये में तेल व्यापार और अन्य अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन को बढ़ावा दे रहा है। यह परिवर्तन अमेरिकी डॉलर वर्चस्व के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है।
ऊर्जा आपूर्ति और भू-राजनीति
चीन की ऊर्जा सुरक्षा उसकी आर्थिक वृद्धि की रीढ़ है। रूस चीन की तेल आवश्यकता का लगभग 20% आपूर्ति करता है, जबकि वेनेजुएला लगभग 4% योगदान देता है। इन आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित करना चीन की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। यूक्रेन संकट में रूस की उलझन ने रूसी ऊर्जा आपूर्ति को पश्चिमी प्रतिबंधों के दायरे में ला दिया है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल तो मची ही, साथ ही चीन-रूस ऊर्जा संबंध भी दबाव में आए। वेनेजुएला की स्थिति और भी जटिल है। अमेरिकी प्रतिबंधों और राजनीतिक अस्थिरता ने वेनेजुएला के तेल उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। भारत की तेल कंपनियों सहित कई अंतर्राष्ट्रीय निवेशक इस अनिश्चितता से प्रभावित हुए हैं।
ट्रंप की दूसरी पारी में “अमेरिका फर्स्ट” की नीति पुनः केंद्र में है। उनकी प्राथमिकताओं में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना, आंतरिक चुनौतियों से निपटना और अमेरिकी डॉलर वर्चस्व को बनाए रखना शामिल है। व्यापार युद्ध, टैरिफ और आर्थिक दबाव उनकी रणनीति के प्रमुख उपकरण रहे हैं। वैश्विक राजनीति में आर्थिक हितों और भू-राजनीतिक रणनीतियों का गहरा संबंध है। अमेरिकी डॉलर वर्चस्व केवल मुद्रा का मामला नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रश्न है। भारत और चीन जैसे देशों का उदय इस संतुलन को बदल रहा है, और इस परिवर्तन के बीच ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मार्ग और मुद्रा नीतियां निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। आने वाले वर्षों में यह प्रतिस्पर्धा और तीव्र होने की संभावना है।

