भारत के रक्षा निर्यात अब 38,424 करोड़ पर: कौन खरीदता है और क्या बेचता है
भारत के रक्षा निर्यात ने वैश्विक हथियार बाजार में देश की मजबूत उपस्थिति को रेखांकित किया है। 2016-17 में मात्र 1,522 करोड़ रुपये से बढ़कर यह अब 25 गुना अधिक हो गया है। निर्यात में स्थिर ऊपरी रुझान दिख रहा है, भले ही मामूली उतार-चढ़ाव आए हों। पहली बार 2018-19 में 10,000 करोड़ का आंकड़ा पार हुआ, महामारी काल में थोड़ी कमी आई, लेकिन 2021-22 से तेज गति पकड़ी। 2023-24 के 21,083 करोड़ से 2025-26 के 38,424 करोड़ तक उछाल आया, जो भारतीय रक्षा उपकरणों की बढ़ती मांग दर्शाता है।
भारत के रक्षा निर्यात: प्रमुख खरीदार कौन?
2016 से 2025 तक भारत के रक्षा निर्यात मुख्य रूप से कुछ प्रमुख खरीदारों पर केंद्रित रहे। म्यांमार सबसे बड़ा बाजार बना, जो कुल निर्यात का 28 प्रतिशत हिस्सा रखता है। इसके बाद फिलीपींस (19 प्रतिशत) और आर्मेनिया (15 प्रतिशत) हैं, जो मिलकर 60 प्रतिशत से अधिक कवर करते हैं। पड़ोसी और क्षेत्रीय देशों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। श्रीलंका ने 13 प्रतिशत हिस्सा लिया, जबकि हिंद महासागर के द्वीपीय राष्ट्र मॉरीशस (8.3 प्रतिशत) और सेशेल्स (6 प्रतिशत) प्रमुख खरीदार साबित हुए। वियतनाम का हिस्सा 5.5 प्रतिशत रहा, जो दक्षिण-पूर्व एशिया से मजबूत रक्षा संबंधों को दिखाता है। अफगानिस्तान, बांग्लादेश, मोरक्को और मालदीव जैसे देशों का संयुक्त योगदान लगभग 5 प्रतिशत है।
नौसेना जहाजों का दबदबा भारत के रक्षा निर्यात में
भारत के रक्षा निर्यात की टोकरी में नौसेना प्लेटफॉर्म हावी हैं। 2016-2025 के बीच जहाजों का हिस्सा 55 प्रतिशत रहा, जो अन्य सभी श्रेणियों से कहीं आगे है। आर्टिलरी सिस्टम दूसरे स्थान पर 13 प्रतिशत के साथ हैं, उसके ठीक बाद मिसाइलें 12 प्रतिशत पर। सेंसर और निगरानी प्रणालियां 9 प्रतिशत, विमान 6 प्रतिशत तथा वायु रक्षा प्रणालियां 5.3 प्रतिशत रखती हैं। बख्तरबंद वाहनों का हिस्सा न्यूनतम 0.3 प्रतिशत ही है। क्षेत्रीय साझेदारों से मजबूत मांग और नौसेना प्रणालियों पर फोकस से भारत के रक्षा निर्यात न केवल तेजी से बढ़ रहे हैं, बल्कि विविधता भी ग्रहण कर रहे हैं।
यह प्रगति ‘मेक इन इंडिया’ पहल की सफलता को दर्शाती है, जो स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा दे रही है। भविष्य में और विस्तार की संभावनाएं हैं।

