पीएसएलवी C62 मिशन में गड़बड़ी, तीसरे चरण में रास्ता भटका, EOS-N1 और 15 सैटेलाइट्स पर असर

पीएसएलवी C62 रॉकेट का प्रक्षेपण, तीसरे चरण में उड़ान पथ विचलन के बाद डेटा विश्लेषण कर रही ISRO टीम।

पीएसएलवी C62 मिशन में गड़बड़ी ने भारत के पहले बड़े स्पेस मिशन 2026 पर सवाल खड़े कर दिए, क्योंकि पीएसएलवी C62 मिशन में गड़बड़ी तीसरे चरण के दौरान सामने आई।

पीएसएलवी C62 मिशन में गड़बड़ी पर ISRO की प्रतिक्रिया

सोमवार को भारत के पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) की 64वीं उड़ान, पीएसएलवी-C62 / EOS-N1, आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से सुबह 10:18 बजे प्रक्षेपित की गई। यह उड़ान 2025 में हुई विफलता के बाद पीएसएलवी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही थी, लेकिन तीसरे चरण के अंत में वाहन के उड़ान पथ में असामान्य विचलन दर्ज किया गया। ISRO चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन ने कहा कि रॉकेट ने शुरुआती चरणों में अपेक्षित प्रदर्शन किया, मगर तीसरे चरण के अंत में वाहन में “डिस्टर्बेंस” दिखाई दी और उड़ान पथ निर्धारित ट्रैक से हटता हुआ दर्ज किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल मिशन को न तो पूर्ण सफलता घोषित किया गया है और न ही विफल, और विस्तृत डेटा विश्लेषण के बाद ही आधिकारिक निष्कर्ष साझा किया जाएगा। पीएसएलवी C62 मिशन में गड़बड़ी को लेकर सभी ग्राउंड स्टेशनों से प्राप्त आंकड़ों की समीक्षा जारी है।

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EOS-N1, Anvesha और अन्य सैटेलाइट्स की योजना

पीएसएलवी-C62 रॉकेट कुल 15 सैटेलाइट्स को लेकर उड़ान भरने के लिए तैयार किया गया था, जिनमें प्रमुख पृथ्वी अवलोकन उपग्रह EOS-N1 और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित सर्विलांस सैटेलाइट “अन्वेषा” शामिल थे। योजना के अनुसार, EOS-N1 और 14 सह-यात्री सैटेलाइट्स को लगभग 505 किलोमीटर ऊंचाई वाली सन सिंक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित किया जाना था, जबकि Kestrel Initial Demonstrator (KID) नामक प्रायोगिक सैटेलाइट को री-एंट्री ट्रेजेक्टरी पर भेजकर पृथ्वी वायुमंडल में पुन: प्रवेश का परीक्षण किया जाना था। DRDO का अन्वेषा सैटेलाइट उन्नत इमेजिंग क्षमता से लैस है, जो उच्च रिज़ॉल्यूशन के साथ रणनीतिक क्षेत्रों की निगरानी और मैपिंग में मदद करने के लिए डिजाइन किया गया है। इस सैटेलाइट के जरिए सीमावर्ती इलाकों, महत्वपूर्ण सैन्य बुनियादी ढांचे और संवेदनशील क्षेत्रों का अधिक सटीक डाटा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था, जिससे भारत की निगरानी और खुफिया क्षमता और अधिक मजबूत हो सके।

EOS-N1 पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट के रूप में कृषि, शहरी नियोजन, पर्यावरणीय निगरानी, आपदा प्रबंधन और संसाधन मानचित्रण जैसे क्षेत्रों में उच्च गुणवत्ता वाले डाटा प्रदान करने के लिए तैयार किया गया था। ISRO की योजना थी कि यह सैटेलाइट बादलों के बीच से भी स्पष्ट इमेजरी उपलब्ध कराने की क्षमता के साथ सरकार और वैज्ञानिक समुदाय को निर्णय लेने में मदद करेगा, लेकिन पीएसएलवी C62 मिशन में गड़बड़ी के कारण उसकी कक्षा में सफल स्थापना पर अब प्रश्नचिह्न लग गया है।

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निजी स्पेस सेक्टर के लिए अहम पड़ाव

यह मिशन भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा था, क्योंकि पहली बार एक ही भारतीय निजी कंपनी ने पीएसएलवी मिशन के लिए सात सैटेलाइट्स का योगदान दिया। हैदराबाद स्थित ध्रुवा स्पेस ने इस उड़ान के लिए सात छोटे उपग्रह तैयार किए, जो संचार, टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेशन और व्यावसायिक प्रयोगों पर केंद्रित थे। इससे घरेलू स्टार्टअप्स और निजी कंपनियों की तकनीकी क्षमता और भरोसे का स्तर ISRO के साथ नई ऊंचाई पर पहुंचता हुआ दिख रहा था। पीएसएलवी को अब तक एक भरोसेमंद चार-चरणीय लॉन्च व्हीकल के रूप में देखा जाता रहा है, जिसने चंद्रयान-1, मंगलयान, आदित्य-L1 और 2017 में 104 उपग्रहों को एक साथ प्रक्षेपित करने जैसे बड़े अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। हालांकि, 2025 में पीएसएलवी-C61 और अब पीएसएलवी C62 मिशन में गड़बड़ी ने लगातार दूसरी बार तीसरे चरण में समस्या को उजागर किया है, जिसके कारण मिशन का पूरा परिणाम डेटा विश्लेषण पर निर्भर हो गया है और भविष्य के उड्डयन के लिए सुधारात्मक कदमों की आवश्यकता पर जोर बढ़ गया है। फिलहाल ISRO विशेषज्ञ तीसरे चरण के प्रदर्शन, प्रोपल्शन सिस्टम और गाइडेंस-कंट्रोल पैरामीटर्स की गहराई से जांच कर रहे हैं ताकि यह समझा जा सके कि उड़ान पथ में विचलन का कारण क्या था। एजेंसी का कहना है कि जैसे ही विश्लेषण पूरा होगा, वे न केवल इस मिशन की वास्तविक स्थिति और सैटेलाइट्स के संभावित नुकसान पर स्पष्ट जानकारी साझा करेंगे, बल्कि अगली उड़ानों के लिए तकनीकी सुधार और डिजाइन परिवर्तन भी सार्वजनिक करेंगे, जिससे भविष्य में इस तरह की पीएसएलवी C62 मिशन में गड़बड़ी जैसी स्थिति दोबारा न सामने आए।

इस घटना ने जहां अंतरिक्ष विज्ञान समुदाय में चिंता पैदा की है, वहीं यह भारत के स्पेस प्रोग्राम के लिए आत्म-मूल्यांकन और टेक्नोलॉजी को और मजबूत बनाने का अवसर भी लेकर आई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पारदर्शी जांच, विस्तृत तकनीकी समीक्षा और निजी क्षेत्र के साथ सहयोग को और बढ़ाकर ISRO न केवल भरोसा बहाल कर सकता है, बल्कि भविष्य में और अधिक जटिल मिशनों की राह भी तैयार कर सकता है।

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