JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद: भड़काऊ नारे पर प्रशासन की सख्त चेतावनी
JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद: यूनिवर्सिटी नहीं बन सकती नफरत की प्रयोगशाला
JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद ने एक बार फिर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक विरोध और अनुशासन के संतुलन को लेकर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। हाल ही में कैंपस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ भड़काऊ नारे लगाए जाने के आरोपों के बाद प्रशासन ने इसे गंभीर उल्लंघन बताते हुए सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विश्वविद्यालय विचारों के आदान–प्रदान, नए विचारों और नवाचार के केंद्र होते हैं, जिन्हें किसी भी स्थिति में नफरत की प्रयोगशाला, यानी JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद की तरह, परिवर्तित होने की अनुमति नहीं दी जा सकती। प्रशासन का कहना है कि ऐसे भड़काऊ और आपत्तिजनक नारे न सिर्फ कैंपस के अनुशासन और शैक्षणिक वातावरण को प्रभावित करते हैं, बल्कि व्यापक स्तर पर सामाजिक सौहार्द पर भी नकारात्मक असर डालते हैं।
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प्रशासन की ओर से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि जिन छात्रों पर माननीय प्रधानमंत्री और माननीय केंद्रीय गृह मंत्री के खिलाफ आपत्तिजनक और भड़काऊ नारे लगाने के आरोप हैं, उनके खिलाफ विश्वविद्यालय के नियमों के तहत सबसे कड़ी कार्रवाई की जाएगी। बयान के अनुसार, JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद से जुड़ी इस घटना को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी गई है और संबंधित प्रावधानों के तहत आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू करने को कहा गया है। हालांकि, पुलिस सूत्रों ने स्पष्ट किया कि फिलहाल शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि हुई है, लेकिन औपचारिक एफआईआर के पंजीकरण की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।
5 जनवरी की विजिल, भड़काऊ नारे और JNUSU का पक्ष
यह पूरा JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद उस समय उभरा जब 5 जनवरी 2026 को छात्र संगठन JNUSU ने कैंपस में एक विजिल का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य 5 जनवरी 2020 को हुए हमलों की याद को जीवित रखना और उस समय सामने आए कथित अन्याय के पैटर्न पर ध्यान आकर्षित करना था। यह कार्यक्रम मुख्य रूप से साबरमती हॉस्टल क्षेत्र के आसपास आयोजित किया गया, जिसे 2020 की हिंसा के दौरान प्रमुख निशाना बताया जाता रहा है।
JNUSU के बयान के अनुसार, इस विजिल के दौरान छात्रों ने 2020 की घटनाओं, कथित हमलों और उसके बाद भी जारी अन्याय के खिलाफ विरोध दर्ज कराया। संगठन का आरोप है कि अब इस शांतिपूर्ण कार्यक्रम को गलत ढंग से पेश किया जा रहा है और JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद के नाम पर छात्रों को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। JNUSU ने कहा कि यह अभियान संगठित रूप से विश्वविद्यालय की छवि खराब करने और छात्रों के खिलाफ दमन को तेज करने की कोशिश जैसा दिखता है, जो लोकतांत्रिक विरोध की भावना के खिलाफ है।
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JNUSU का यह भी कहना है कि मीडिया का एक हिस्सा, जिसका दायित्व सत्ता से सवाल पूछना और सच सामने लाना है, वह सरकार के साथ खड़े होकर छात्रों के खिलाफ कथित रूप से पक्षपाती रिपोर्टिंग कर रहा है। छात्र संगठन के मुताबिक, JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद के संदर्भ में जिस तरह से खबरें दिखाई जा रही हैं, उससे यह संदेश जाता है कि विश्वविद्यालय में हर प्रकार का विरोध नफरत की राजनीति के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और संदर्भ–विशेष है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अनुशासन और विश्वविद्यालय की भूमिका
दूसरी ओर, JNU प्रशासन का तर्क है कि विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का सम्मान किया जाता है, लेकिन यह अधिकार किसी भी व्यक्ति, संवैधानिक पद या समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाले नारों के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। प्रशासन ने JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे नारे न सिर्फ विश्वविद्यालय के आचार संहिता का उल्लंघन हैं, बल्कि वे सर्वोच्च न्यायालय के उन निर्देशों के भी खिलाफ हो सकते हैं, जिनमें सार्वजनिक स्थानों पर नफरत भड़काने वाली भाषण शैली पर रोक की बात कही गई है।
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प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि यदि इस तरह के कथित भड़काऊ और उत्तेजक नारे बिना कार्रवाई के छोड़ दिए जाएं तो इससे भविष्य में और भी गंभीर घटनाओं का रास्ता खुल सकता है। इसलिए JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद के मामले में सख्ती दिखाते हुए विश्वविद्यालय ने न केवल आंतरिक अनुशासनात्मक प्रक्रिया शुरू करने की बात कही है, बल्कि पुलिस और अन्य कानूनी एजेंसियों के साथ समन्वय कर आगे की जांच और कार्रवाई का रास्ता भी खोल दिया है।
यह पूरा घटनाक्रम एक व्यापक बहस को जन्म देता है कि विश्वविद्यालय कैंपस किस हद तक राजनीतिक असहमति और विरोध–प्रदर्शनों की जगह हो सकते हैं, और किस बिंदु पर प्रशासन को हस्तक्षेप करते हुए यह सुनिश्चित करना होता है कि परिसर नफरत, हिंसा या असहिष्णुता के मंच में न बदल जाए। JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद ने इस प्रश्न को और तेज कर दिया है कि क्या विश्वविद्यालयों में विरोध की भाषा और शैली के लिए भी कुछ मर्यादाएं तय की जानी चाहिए, ताकि नवाचार, शोध और सकारात्मक बहस के लिए आवश्यक शांति और सुरक्षित माहौल बना रहे। ]
JNUSU और JNU प्रशासन, दोनों की अलग–अलग व्याख्याओं के बीच अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि पुलिस जांच और विश्वविद्यालय की आंतरिक प्रक्रियाएं आगे क्या निष्कर्ष निकालती हैं। यह भी देखा जाएगा कि JNU लैबोरेटरी ऑफ हेट विवाद के बहाने शुरू हुई यह बहस क्या किसी समावेशी समाधान तक पहुंच पाती है, जिसमें एक ओर छात्रों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे और दूसरी ओर नफरत फैलाने वाले किसी भी स्वर को समय रहते रोका जा सके।

