114 साल पहले दिल्ली भारत की राजधानी क्यों बनी? जानिए 1911 का पूरा इतिहास
114 साल पहले दिल्ली भारत की राजधानी क्यों बनी?
12 दिसंबर 1911 को ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम ने दिल्ली को भारत की राजधानी घोषित किया था। इस ऐतिहासिक निर्णय को 114 वर्ष पूरे हो चुके हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अंग्रेजों ने कलकत्ता को छोड़कर दिल्ली भारत की राजधानी क्यों बनाया? आइए जानते हैं इस महत्वपूर्ण निर्णय के पीछे के कारणों को।
कलकत्ता से दिल्ली: राजधानी का स्थानांतरण
1911 से पहले कलकत्ता (अब कोलकाता) ब्रिटिश भारत की राजधानी थी। लेकिन 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार के दौरान किंग जॉर्ज पंचम ने एक ऐतिहासिक घोषणा की और दिल्ली भारत की राजधानी बनाने का निर्णय लिया। यह निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं था, बल्कि इसके पीछे कई रणनीतिक और भौगोलिक कारण थे।
प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखिका स्वपना लिडिल ने इस निर्णय के पीछे के कारणों को विस्तार से समझाया है। उनके अनुसार, दिल्ली की भौगोलिक स्थिति इस निर्णय में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
दिल्ली की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह भारत के दो प्रमुख व्यावसायिक केंद्रों—कलकत्ता और बॉम्बे (अब मुंबई)—से लगभग समान दूरी पर स्थित थी। यह केंद्रीय स्थिति प्रशासनिक दृष्टि से बेहद फायदेमंद थी। राजधानी से दोनों प्रमुख शहरों तक पहुंचना आसान था, जिससे व्यापार और प्रशासन दोनों सुचारू रूप से चल सकते थे।
इसके अलावा, दिल्ली शिमला के भी करीब थी, जो गर्मियों में अंग्रेज अधिकारियों की पसंदीदा जगह थी और जहां से वे अपना काम संचालित करते थे।
रियासतों से निकटता और ऐतिहासिक महत्व
दिल्ली अधिकांश रियासतों के केंद्र में स्थित थी। उस समय भारत में सैकड़ों रियासतें थीं जो अंग्रेजों के अधीन या उनके साथ संधि में थीं। दिल्ली भारत की राजधानी बनने से इन रियासतों पर नियंत्रण रखना और उनसे संपर्क बनाए रखना आसान हो गया। यह रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
दिल्ली का ऐतिहासिक महत्व भी इस निर्णय में एक बड़ा कारण था। स्वपना लिडिल के अनुसार, दिल्ली अतीत में कई साम्राज्यों की राजधानी रह चुकी थी। मुगल साम्राज्य, दिल्ली सल्तनत और अन्य शासकों ने दिल्ली को अपनी सत्ता का केंद्र बनाया था। यह शहर सदियों से शक्ति और प्रभुत्व का प्रतीक रहा है।
इस ऐतिहासिक विरासत को अपनाकर अंग्रेज यह संदेश देना चाहते थे कि वे भी उसी परंपरा के उत्तराधिकारी हैं जिसने भारत पर शासन किया।
कलकत्ता में बढ़ता राष्ट्रवादी आंदोलन भी राजधानी परिवर्तन का कारण बना। बंगाल में ब्रिटिश विरोधी भावना मजबूत हो रही थी और 1905 के बंगाल विभाजन के बाद स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई। इसके अलावा, कलकत्ता भारत के पूर्वी छोर पर स्थित था, जो पूरे देश के प्रशासन के लिए उपयुक्त नहीं था।
राजधानी के स्थानांतरण के बाद पुरानी दिल्ली के दक्षिण में एक नए शहर का निर्माण शुरू किया गया। एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने नई दिल्ली की योजना बनाई। इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन और संसद भवन जैसी इमारतें इसी काल में बनीं।
1947 में स्वतंत्रता के बाद भी दिल्ली भारत की राजधानी बनी रही। इसकी केंद्रीय स्थिति, बेहतर बुनियादी ढांचा और ऐतिहासिक विरासत के कारण यह निर्णय आज भी प्रासंगिक है।
114 साल पहले लिया गया यह फैसला भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। दिल्ली भारत की राजधानी केवल प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि देश की पहचान और विरासत का प्रतीक बन चुकी है।

