सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गवर्नर की टाइमलाइन पर रोक, संवैधानिक अधिकार स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और गवर्नर की बिल मंजूरी प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: संवैधानिक अधिकारों पर महत्वपूर्ण स्पष्टता

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आज देश में शासन और संवैधानिक प्रक्रिया को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। इस ऐतिहासिक निर्णय में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति और राज्यों के गवर्नर को विधायिका द्वारा भेजे गए बिलों को मंजूरी देने के लिए किसी तरह की न्यायालय-निर्धारित समयसीमा के भीतर काम करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के संतुलन पर प्रकाश डालता है, बल्कि संविधान के मूल सिद्धांतों से भी सीधा जुड़ाव रखता है। यही कारण है कि यह विषय वर्तमान राजनीतिक और कानूनी परिदृश्य में अत्यंत चर्चा का विषय बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से मांगे गए स्पष्टीकरण के जवाब में आया। यह स्पष्टीकरण दो-न्यायाधीशों की उस पीठ के निर्णय के बाद मांगा गया था, जिसमें तमिलनाडु के राज्यपाल से जुड़े मामले में बिलों की मंजूरी के लिए समयसीमा तय करने जैसी व्याख्या सामने आई थी। राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 143 के तहत पूछा था कि क्या जब संविधान किसी समयसीमा का उल्लेख नहीं करता, तो क्या अदालतें ऐसे मामलों में समयसीमा निर्धारित कर सकती हैं।

मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अगुवाई वाली संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि गवर्नर या राष्ट्रपति की कार्रवाइयों को ‘जस्टिसेबल’ नहीं माना जा सकता और न्यायिक समीक्षा केवल तब संभव है जब कोई बिल कानून बन चुका हो। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 200 और 201 संविधान के ऐसे प्रावधान हैं, जिनमें स्वाभाविक रूप से लचीलापन समाहित है और इस लचीलेपन को अदालत की ओर से निर्धारित किसी समयसीमा द्वारा सीमित नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसीलिए संविधान में निहित शक्ति-विभाजन के सिद्धांत की रक्षा करता हुआ प्रतीत होता है।

तमिलनाडु मामले में दो-न्यायाधीशों की पीठ ने कई बिलों को ‘deemed assent’ यानी स्वीकृत माना था, क्योंकि उन्हें लंबे समय तक रोका गया था। परंतु वर्तमान में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ऐसी अवधारणा को अस्वीकार करते हुए कहा गया कि ‘deemed assent’ की व्याख्या न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका की भूमिका लेने के समान होगी, जो संविधान के ढांचे के विपरीत है।

हालांकि, अदालत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी भी की। उसने कहा कि यदि गवर्नर की ओर से अनिर्दिष्ट, अनावश्यक और अत्यधिक विलंब किया जाता है, तो ऐसी स्थिति में सीमित न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। इसका अर्थ है कि अदालत ने संतुलन बनाए रखा—गवर्नर की स्वतंत्रता बरकरार, लेकिन बिना किसी अनुचित देरी के।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह भी रेखांकित करता है कि संविधान की कार्यप्रणाली आपसी सहयोग पर आधारित है। किसी भी संवैधानिक संस्था को स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि परस्पर निर्भरता के ढांचे में कार्य करना चाहिए। इन संस्थाओं को लोकतांत्रिक मूल्यों और संघीय ढांचे की रक्षा करते हुए कार्य करना होता है ताकि शासन में पारदर्शिता और संतुलन बना रहे।

इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल संवैधानिक प्रक्रियाओं पर स्पष्टता प्रदान करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि लोकतांत्रिक ढांचा सही दिशा में संचालित होता रहे। गवर्नर और राष्ट्रपति के अधिकारों, उनकी भूमिकाओं और सीमाओं पर यह निर्णय आने वाले वर्षों तक एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बना रहेगा।

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