हमास का इस्लाम से रिश्ता क्या है? गाजा शांति समझौते की असलियत उजागर
हमास का इस्लाम से रिश्ता अक्सर धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाता है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं गहरी और जटिल है। हाल ही में हमास ने मिस्र में प्रस्तावित गाजा शांति समझौते के हस्ताक्षर समारोह में भाग लेने से इनकार कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की शांति योजना पर प्रतिक्रिया देते हुए हमास के राजनीतिक ब्यूरो के सदस्य होसाम बदरान ने कहा, “हमास सदस्यों को गाजा पट्टी छोड़ने की बात बेतुकी और बकवास है। फिलिस्तीनियों को निष्कासित करने की बात — चाहे वे हमास सदस्य हों या नहीं — निरर्थक है।”
हमास का इस्लाम से रिश्ता और वास्तविक एजेंडा
यह समझना आवश्यक है कि हमास का इस्लाम से वास्तविक संबंध धार्मिक कम और रणनीतिक अधिक है। संगठन ने इस्लाम का चोला ओढ़ा हुआ है, जबकि असली एजेंडा भू-राजनीतिक है। इसे एक आतंकवादी संगठन के रूप में भी देखा जाता है जिसने धर्म को एक आवरण बनाया है।
हमास की फंडिंग का सच:
- ईरान से भारी वित्तीय सहायता
- चीन का अप्रत्यक्ष समर्थन
- अमेरिका और इजराइल का विरोध करने वाले अन्य देशों का सहयोग
ये सारी फंडिंग धार्मिक नहीं बल्कि रणनीतिक हितों से प्रेरित हैं। ये देश अपने राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ के लिए हमास का इस्तेमाल कर रहे हैं।
वैश्विक शक्ति संतुलन का खेल
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि मध्य पूर्व में शांति स्थापित हो जाती है, तो अमेरिका का ध्यान दक्षिण चीन सागर की ओर केंद्रित हो जाएगा। वहां चीन पर दबाव बढ़ेगा, और यही कारण है कि चीन के लिए मध्य पूर्व में अस्थिरता बनाए रखना उसके रणनीतिक हित में है।
घटनाओं का समय भी इस ओर इशारा करता है:
- अमेरिका चीन पर 100% टैरिफ लगाता है
- इसके तुरंत बाद हमास शांति समझौते से पीछे हट जाता है
क्या यह संयोग है? शायद नहीं। यह एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा लगता है।
आने वाला तूफान और धार्मिक युद्ध की तैयारी
विश्व राजनीति में एक खतरनाक मोड़ आता दिख रहा है। इस्लाम और ईसाईयत के बीच एक बड़े संघर्ष की भूमिका तैयार हो रही है। लेकिन यह युद्ध धार्मिक से अधिक भू-राजनीतिक होगा। आम जनता को धर्म के नाम पर लड़ाया जाएगा जबकि असली ताकतें पर्दे के पीछे से डोर खींचेंगी।
संकेत स्पष्ट हैं:
- मध्य पूर्व में लगातार तनाव
- शांति प्रयासों की विफलता
- वैश्विक शक्तियों का ध्रुवीकरण
- धार्मिक भावनाओं को भड़काना
शांति समझौता: एक असंभव सपना?
यह स्पष्ट होता जा रहा है कि शांति समझौते की राह आसान नहीं है। इसके कई कारण हैं:
- कई देशों के हित इससे जुड़े हैं
- शांति से किसी को राजनीतिक फायदा नहीं
- अशांति से हथियारों का व्यापार चलता है
- भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन बना रहता है
हमास के फैसले को केवल एक संगठन के कदम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक बड़ी वैश्विक रणनीति का हिस्सा है जहां धर्म को हथियार बनाया जा रहा है और आम लोग शतरंज के मोहरे बन चुके हैं।
सवाल यह नहीं है कि शांति कब होगी, बल्कि यह है कि क्या कोई वास्तव में शांति चाहता भी है? जब तक वैश्विक शक्तियों के हित मध्य पूर्व की अशांति में निहित रहेंगे, तब तक शांति एक दूर का सपना ही रहेगी — और आम फिलिस्तीनी और इजरायली जनता इसकी कीमत चुकाती रहेगी।
यह विश्लेषण वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर आधारित एक स्वतंत्र दृष्टिकोण है जो पाठकों को व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान करने के उद्देश्य से लिखा गया है।

