CSDS घोटाला: भारत में चुनावी डेटा की विश्वसनीयता पर सवाल
CSDS घोटाला भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। भारत में चुनावी डेटा और जाति आधारित मतदान के विश्लेषण की बात आती है तो सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (CSDS) का नाम सबसे पहले लिया जाता है। लेकिन क्या यह संस्था वास्तव में भारत के 90 करोड़ मतदाताओं की सही तस्वीर पेश करती है, या फिर यह एक सुनियोजित घोटाला है?
CSDS घोटाला और विवादास्पद स्थिति
CSDS की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह 1960 के दशक से भारत सरकार से फंडिंग प्राप्त करती आई है, लेकिन आधिकारिक तौर पर इसे गैर-सरकारी संस्था माना जाता है। इस दोहरे चरित्र ने कई सवाल खड़े किए हैं। सरकारी फंडिंग के बावजूद यह सरकारी नियंत्रण से बाहर है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों संदिग्ध हो जाते हैं।
जाति आधारित डेटा और विवाद
CSDS नियमित रूप से जाति आधारित मतदान के आंकड़े प्रस्तुत करता है। लेकिन इस प्रक्रिया में कई खामियां सामने आती हैं। सबसे पहले, सैंपल साइज अपर्याप्त होता है। 90 करोड़ मतदाताओं के बीच से चुने गए छोटे से समूह से पूरे देश की राजनीति को परिभाषित करना कितना वैज्ञानिक है, यह प्रश्न बना हुआ है। इसके अलावा सर्वे की वैज्ञानिक पद्धति अस्पष्ट है और डेटा कलेक्शन की प्रक्रिया भी पारदर्शी नहीं दिखती।
हाल ही में संजय कुमार का खुलासा सामने आया कि राहुल गांधी द्वारा उपयोग किया गया डेटा CSDS का था और वह गलत था। इसने CSDS घोटाला को और गहराई दी। इससे संस्थान की विश्वसनीयता, राजनीतिक दुरुपयोग और मीडिया की भूमिका सभी पर सवाल खड़े हो गए हैं।
वैज्ञानिकता और सामाजिक प्रभाव
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सर्वे करना बेहद कठिन है। भौगोलिक विविधता, सामाजिक-आर्थिक स्तरीकरण, भाषाई चुनौतियां और शहरी पूर्वाग्रह जैसी समस्याओं के बीच CSDS के सर्वे नतीजों की वैज्ञानिकता पर गंभीर सवाल हैं। जाति आधारित डेटा का राजनीतिकरण सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है और वोट बैंक की राजनीति को मजबूत करता है।
इसी वजह से CSDS घोटाला भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा साबित हो सकता है। गलत या पूर्वाग्रहग्रस्त डेटा न केवल जनता को गुमराह करता है बल्कि राजनीतिक खेल को भी प्रभावित करता है।
सुधार की आवश्यकता
CSDS जैसी संस्थाओं के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। इसके लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा, नियमित ऑडिट और वैज्ञानिक पद्धति का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। साथ ही, राजनीतिक दुरुपयोग रोकने के लिए नैतिक दिशा-निर्देश लागू करना भी आवश्यक है।
निष्कर्षतः, संजय कुमार के हालिया खुलासे ने यह साबित कर दिया है कि CSDS डेटा की विश्वसनीयता संदिग्ध है। यह समय है कि हम इस CSDS घोटाले की गंभीरता को समझें और पारदर्शी संस्थाओं की मांग करें, ताकि भारत की जनता को सही और निष्पक्ष चुनावी डेटा मिल सके।
External Resource: Economic & Political Weekly

