भारत में हाइड्रोजन: औद्योगिक संक्रमण और 5 मिलियन टन लक्ष्य
भारत में हाइड्रोजन मिशन ने 2025 में हरित ऊर्जा की दिशा में महत्वाकांक्षी कदम बढ़ाए हैं। सरकार के ₹19,744 करोड़ के राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य 2030 तक सालाना 5 मिलियन टन उत्पादन है। यह पहल न केवल ऊर्जा संक्रमण को गति दे रही है बल्कि औद्योगिक संक्रमण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
गुजरात, ओडिशा और तमिलनाडु के रणनीतिक विकास
गुजरात के औद्योगिक बेल्ट में प्रारंभिक सुविधाएं आकार ले रही हैं। इसकी मजबूत अवसंरचना और तटीय स्थिति भारत में हाइड्रोजन उत्पादन के लिए इसे आदर्श बनाती है। वहीं ओडिशा के पोर्ट कॉम्प्लेक्स हाइड्रोजन निर्यात के लिए रणनीतिक महत्व रखते हैं। राज्य की खनिज संपदा और बंदरगाह सुविधाएं इसे हाइड्रोजन हब बनाने में सहायक हैं। तमिलनाडु के नवीकरणीय ऊर्जा कॉरिडोर, अपनी पवन और सौर ऊर्जा क्षमता के साथ, हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए स्वच्छ ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं।
आर्थिक प्रभाव और वैश्विक स्थिति
यह मिशन निवेश और रोजगार के नए अवसर खोल रहा है। अनुसंधान, विनिर्माण, और सेवा क्षेत्रों में लाखों नौकरियां सृजित होंगी। भारत में हाइड्रोजन के बढ़ते उत्पादन से ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी। यूरोप और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती मांग का लाभ उठाकर भारत वैश्विक हाइड्रोजन निर्यातक के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।
हालांकि उत्पादन लागत वर्तमान में अधिक है, लेकिन तकनीकी सुधार और बड़े पैमाने पर उत्पादन से लागत कम होने की संभावना है। भंडारण और परिवहन की चुनौतियों के समाधान के लिए पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर और विशेष टैंकों पर निवेश बढ़ाया जा रहा है।
2030 तक 5 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन का लक्ष्य भारत को वैश्विक हाइड्रोजन बाजार में अग्रणी बनाएगा। स्टील, सीमेंट, रसायन और उर्वरक उद्योगों में इसके उपयोग से औद्योगिक संक्रमण तेज होगा। परिवहन क्षेत्र में हाइड्रोजन-संचालित वाहनों की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं।
निष्कर्षतः, भारत में हाइड्रोजन मिशन न केवल ऊर्जा परिवर्तन का प्रतीक है बल्कि पर्यावरणीय स्थिरता और आर्थिक विकास के लिए एक ठोस आधार भी है। गुजरात, ओडिशा और तमिलनाडु जैसे राज्यों में हो रहे विकास से स्पष्ट है कि भारत आने वाले दशक में वैश्विक हाइड्रोजन आपूर्तिकर्ता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करेगा।

