इज़राइल-कतर संघर्ष: नेतन्याहू की आक्रामक नीति और विश्व राजनीति पर असर

इज़राइल-कतर संघर्ष

इज़राइल-कतर संघर्ष ने मध्य पूर्वी राजनीति में भूचाल ला दिया है। 9 सितंबर 2025 को इज़राइल ने कतर की राजधानी दोहा में हमास नेताओं पर सीधा हमला किया। यह हमला उस समय हुआ जब गाजा युद्धविराम पर अमेरिकी प्रस्ताव पर चर्चा चल रही थी। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे “पूर्णतया स्वतंत्र इज़राइली ऑपरेशन” बताते हुए पूरी जिम्मेदारी ली।

कतर की तीखी प्रतिक्रिया और अमेरिकी दुविधा

कतर के प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान बिन जासिम अल-थानी ने इस हमले को “राज्य आतंकवाद” करार दिया। उन्होंने कहा कि नेतन्याहू ने इज़राइली बंधकों के लिए किसी भी उम्मीद को खत्म कर दिया। कतर के विदेश मंत्रालय ने इसे आपराधिक हमला बताते हुए अपनी संप्रभुता पर सीधा आक्रमण कहा।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी असहजता जताते हुए कतर को अमेरिका का मजबूत सहयोगी बताया। उन्होंने कतर के अमीर को आश्वासन दिया कि उनकी भूमि पर ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी। हालांकि, नेतन्याहू ने दावा किया कि यह हमला शांति स्थापित करने में मदद कर सकता है।

नेतन्याहू की आक्रामक नीति और क्षेत्रीय प्रभाव

व्हाइट हाउस ने शुरू में कहा कि कतर को पहले सूचित किया गया था, लेकिन दोहा ने इस दावे को खारिज कर दिया। ट्रंप ने बाद में स्वीकार किया कि चेतावनी देने में देरी हुई। यह अमेरिका को दुविधा में डालता है क्योंकि इज़राइल और कतर दोनों उसके महत्वपूर्ण सहयोगी हैं।

नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि यदि कतर हमास नेताओं को निष्कासित या न्यायालय के समक्ष पेश नहीं करता, तो इज़राइल उन्हें कहीं भी निशाना बनाएगा। यमन पर हालिया हमलों ने भी इज़राइल की इस नीति को उजागर किया कि वह क्षेत्रीय स्थिरता की परवाह किए बिना अपने दुश्मनों पर कार्रवाई करेगा।

कतर अब गाजा युद्धविराम में अपनी मध्यस्थता भूमिका और हमास के भविष्य को लेकर पुनर्मूल्यांकन कर रहा है। यह हमला मुस्लिम देशों के बीच इज़राइल विरोधी भावना को और मजबूत कर सकता है। इससे अरब लीग और इस्लामिक सहयोग संगठन में कड़ी कार्रवाई की मांग बढ़ सकती है।

यह घटना दिखाती है कि अमेरिकी रक्षा बिक्री के बावजूद ट्रंप का नेतन्याहू पर सीमित प्रभाव है। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका-इज़राइल संबंधों में तनाव, मध्य पूर्व में शांति प्रक्रिया का जटिल होना और क्षेत्रीय युद्ध की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

नेतन्याहू की आक्रामक नीति इज़राइली बंधकों की उम्मीदों और वैश्विक शांति दोनों के लिए खतरा है। यदि मुस्लिम देश एकजुट होकर प्रतिक्रिया देते हैं, तो यह न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्थिरता को भी प्रभावित करेगा।

अमेरिकी विदेश नीति की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं। मध्य पूर्व में शांति के लिए नेतन्याहू की नीतियों पर अंकुश लगाना अब आवश्यक हो गया है।

अधिक जानकारी के लिए देखें: संयुक्त राष्ट्र आधिकारिक वेबसाइट

Disclaimer(अस्वीकरण) : यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विश्लेषण और विचारों पर आधारित है। इसमें व्यक्त की गई राय केवल वर्तमान  स्थिति का अध्ययन और आकलन है। इसका उद्देश्य किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में प्रचार करना नहीं है

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